उफ, इन पुरुषों को सुधारने की कोशिश ही बेकार है। ये उद्गार किसी एक स्त्री के नहीं अनेक स्त्रियों के होंगे। इसी गंभीर समस्या को लेकर सखी ने बातचीत की कुछ स्त्रियों से और इस बात की तह तक जाने की आखिर परेशानी कहां है?
हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पहले जैसी आसान नहीं रही। बढती व्यस्तता और जिम्मेदारियों के बोझ ने स्त्री, विशेषकर कामकाजी स्त्री को और कठिन परिस्थितियों में ला खडा किया है। ऐसे में जहां उसकी कार्यक्षमता पहले से दोगुनी हुई है, वहीं चुनौतियों और जिम्मेदारियों में भी खासी बढोतरी हुई है। आइए काउंसलर डॉ.अनु गोयल से जानें कि समस्या है कहां और इनका हल क्या है?
अनुशासन की कमी
मल्टीनेशनल कंपनी की कंट्री हेड के जिम्मेदार पद को बखूबी संभालने वाली रूपाली अपने चार जनों के परिवार को संभालने में अक्षम साबित हो रही थी। उसका कहना था कि सास अपने बेटे और इकलौते पोते का इतना लाड करती हैं कि दोनों अनुशासन का अ भी नहीं जानते। घर की कोई भी चीज जगह पर नहीं मिलेगी चाहे वे महत्वपूर्ण कागजात ही क्यों न हों। कुछ भी कहने या नाराज होने की कहीं गुंजाइश नहीं क्योंकि सुरक्षा कवच लगा कर सास खडी होती हैं। अब घर के सभी सदस्यों के साथ तो अकेला इंसान लड नहीं सकता। अकेला चना भाड नहीं फोड सकता। मुसीबत तो यह थी कि उसका पांच साल का बेटा तो नासमझ था, लेकिन पति तो पढा-लिखा था। फिर उसे यह तकलीफक्यों नहीं समझ में आती। हजार बार कोशिश करने पर भी हालात वहीं के वहीं थे। उन्हें इस तरीके में ज्यादा आराम व सुविधा थी इसलिए वह बदलाव लाने को तैयार नहीं थे। यह समझने की कोशिश भी नहीं कर रहे कि यह बात आगे चलकर बच्चे के लिए कितनी नुकसानदेह है।
काउंसलर : इसमें संदेह नहीं कि आराम और सुविधा कौन नहीं चाहता। ये भारतीय संयुक्त परिवारों की आम समस्या है। बच्चे को व्यस्त रखें और आत्मनिर्भर बनाएं। कोशिश करें कि घर की जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति पर हो।
गंदगी का आलम
मोना पति के बिजनेस में हाथ बंटाने वाली पढी लिखी लडकी है। मुंबई के शानदार फ्लैट में रहने वाली मोना का कहना है कि इतने सुंदर घर का क्या फायदा। जहां देखो वहीं गीली गंदी चप्पल के निशान नजर आ जाएंगे। बाहर के जूते पहनकर घर में घूमने से पूरे घर में गंदगी फैली रहती है। जहां काम करेंगे वहीं आसपास कागज के टुकडे मिल जाएंगे। पहने हुए कपडे कभी उतार कर धुलने के लिए नहीं डालेंगे।
काउंसलर: देखिए कुछ आदतें इनबिल्ट होती हैं। उन्हें दूर करना काफी कठिन होता है। एक बाथरूम स्लीपर टॉयलेट के बाहर रख सकती हैं। बच्चों को लगातार सिखाएं। चाहें तो सजा के रूप में जगह पर कपडे न रखने पर, एक सप्ताह तक उनके कपडे बिना धुले रहने दें।
टी.वी. से प्रेम
माना कि टेलीविजन मनोरंजन के साथ संचार का बेहतर माध्यम है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि संसार की खबरें देखते-देखते आप घर की दुनिया से बेखबर हो जाएं। यह समस्या है आस्था की। वह सारे दिन बेसब्री से इंतजार करती कि शाम को विक्रम के आने पर यह बात कहेगी, उस मसले पर डिस्कस करेगी, लेकिन शाम होने तक हालात ही बदले होते। पति आते ही बैग थमा रिमोट ले टीवी ऑन कर ज्यों उसके सामने बैठते फिर वहां से उन्हें हिलाना एकदम नामुमकिन था। चाय भी वहीं और खाना भी वहीं। यदि डाइनिंग टेबल पर बैठ कर डिनर करने का आग्रह करे तो फिर देर रात का इंतजार करना होगा। अब बच्चों की भी टी.वी. देखते हुए खाने-पीने की आदत हो गई।
काउंसलर : अकसर पुरुष पत्नी को नजरअंदाज करने के लिए भी यह करते हैं। पत्नी की बात सुनो फिर अपने ऊपर जिम्मेदारी लो इससे अच्छा है कि टी.वी. पर ध्यान लगाओ। थोडा कठिन है उन्हें वापस लाना, लेकिन कोशिश आपको करनी होगी। इस समस्या में बच्चों की मदद लेना बेहतर होगा।
बाथरूम सिंगर
मुझे नहीं पता कि यह समस्या मेरे जैसी कितनी पत्नियों को होगी। सुबह घर में घर से निकलने की मारामारी होती है उस पर पतिदेव हैं कि बाथरूम में एक बार चले जाएं तो मुकेश के सभी गीत गाने के बाद ही बाहर आएंगे। अब आपको देर हो रही है तो इसमें वह क्या करें। बेटी रीना का कहना है कि मम्मी प्लीज पापा को बोलो यह काम रात को कर लिया करें। मेरा लेक्चर मिस हो जाता है। राहुल के साथ मुझे भी ऑफिस पहुंचने की जल्दी होती है। सवाल तैयार होने का नहीं ब्रेकफस्ट का है। यदि लंच नहीं पकडाया तो बिना लंच चले जाएंगे। यदि नाश्ता हाथ में नहीं दिया तो बिना खाए चले जाएंगे। ये शिकायत है बैंक अफसर इरा की।
काउंसलर: पीछे-पीछे मत फिरिए। थोडा छोड कर देखिए कि क्या होता है? यदि आपकी कोशिशें नाकाम हैं तो प्रोफेशनल हेल्प लें। वैसे हर व्यक्ति को अपने लिए अलग स्पेस चाहिए होता है।
लापरवाही का कोई अंत नहीं
क्या कभी आपने सुना है कि कोई व्यक्ति रात साढे गयारह बजे पेट्रोल पंप पर खडा हो और पर्स उसकी जेब में न हो। पेट्रोल की सुई कब की नीचे पहुंच इशारा कर चुकी थी, लेकिन यह साहब थे कि इन्हें होश नहीं। ऑफिस से करीब डेढ किलोमीटर तक गाडी किसी तरह खींच वहां तक पहुंचने पर पता चला कि पर्स तो आज बेगम ने रखा ही नहीं। आख्िार घडी उतार कर पेट्रोल पंप वाले को देनी पडी। घर आकर झल्लाहट निकालने पर पत्नी ने कहा कि यदि मैं पर्स नहीं रखूं तो तुम क्या करोगे और तो और चौबीस घंटे खुले रहने वाले ए.टी.एम. भी इनके सामने बेकार हैं क्योंकि इन्हें पैसे निकालने आते नहीं। यह हैं हमारे साहब। परेशान होकर लता ने अपना दुखडा रोया। स्वयं एक प्रतिष्ठित मीडिया कंसर्न से जुडी लता के पति भी मीडिया पर्सन थे।
काउंसलर: शादी के चौदह सालों में आपने जो आदतें पति को डाल दी हैं उनका खामियाजा आपको ही भुगतना होगा। उन्हें जिम्मेदार बनाने की जगह आपने उन्हें लापरवाह और गैर जिम्मेदार बना दिया है।
बचकाना व्यवहार
यूं तो सब ठीक है लेकिन मेरे पति को बच्चा बनते देर नहीं लगती। स्कूल में अध्यापन कर रही भारती का कहना था। ऑफिस में वह भले ही बॉस हों, लेकिन जरा सा सर्दी-जुकाम होते ही बच्चे बन जाते हैं। कहीं हिलने की इजाजत नहीं होती। कभी सिर दबाओ तो कभी डॉक्टर बुलाओ। थोडा सा सब्र तो होना ही चाहिए। तौलिया नहीं मिल रहा तो हल्ला, चप्पल नहीं मिल रही तो हल्ला, और तो और अखबार यदि समय पर नहीं आया तो भी परेशानी। अब इसमें मेरा क्या कसूर?
काउंसलर: हर व्यक्ति के भीतर उसका बचपन छिपा रहता है, जो जरूरत पडने पर कभी भी बाहर आ जाता है। आपको थोडा व्यावहारिक बनना होगा। उन्हें वयस्क की तरह व्यवहार करने दें। थोडी मजबूती और कठोरता आपको अपने भीतर लानी होगी।
व्यावहारिकता से कोसों दूर
बडे अजीब आदमी हैं जरा सी भी व्यावहारिकता नहीं। घर में कोई भी आए या जाए उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। उनके रिश्तेदार आएं तो भी मुझे देखना है और मेरे मिलने वाले आएं तब तो मुझे देखना है। मेरी कजन विदेश से आई यह नमस्ते करने के बाद ज्यों अंदर गए वापस बाहर आने का नाम ही नहीं लिया। वह पूछने लगी कि क्या उन्हें मेरा आना अच्छा नहीं लगा। मैंने सफाई दी, लेकिन शायद वह झेंप मिटाने के बहाने भर थे। कई बार उनकी इस आदत के कारण इतनी खराब स्थिति हो जाती है कि कुछ कहते नहीं बनता।
काउंसलर: यह आदत बदलनी थोडी कठिन है। आपको इसे समझ कर दूसरों को भी समझाना पडेगा। उनकी कमी को अपने व्यवहार से पूरा करने की कोशिश करें।
ये आदतें या व्यवहार किसी पत्नी के लिए मुश्किलें खडी करने वालीं हैं ही। लेकिन समस्या की जड में जाकर देखें कि कहीं आप स्वयं तो इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। तो फिर उन्हें सुधारने के साथ-साथ अपने को भी सुधारें।
संध्या मिश्रा
भारतीय एकता संगठन
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